परमहंस संहिता श्रीमद् भागवत के साधनात्मक सूत्र

अमृतवाणी ( Part 8 )

अप्रवासी भारतीयों के समक्ष स्वामी श्री अड़गड़ानन्द जी महाराज का उद्बोधन प्रयाग कुम्भ- 10-02-2007

आर्य, सनातन और हिंदू धर्म

धर्म का वास्तविक स्वरूप

जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति

इस कृति में परमहंस महाराज, योग-योगेश्वर, ब्रह्मलीन स्वामी श्री परमानन्द जी का आदर्श जीवन, आश्चर्यजनक घटनाएँ, आत्मानुभूति के चरमोत्कर्ष पर आसीन कराने वाली उनकी अमर-वाणी, बारहमासी, सदुपदेशों की झलकियाँ, लोकोत्तर शक्तियाँ एवं विद्या का संकलन है। जिसके माध्यम से जीवन पथ पर चलने वाले भाविकों का पथ-प्रदर्शन होता है एवं इसको हृदयंगम करके साधक सर्वोत्कृष्ट लक्ष्य की ऊँचाइयों को छू सकता है। साधकों के लिए यह बहुत उपयोगी ग्रन्थ है।

शंका – समाधान

इस कृति में अनेक प्रश्नों का समाधान किया गया है जो सामाजिक बिखराव के उन्मूलन तथा धार्मिक भ्रान्तियों के निवारण में सहायक है। इसमें भजन किसका करे, कर्मकाण्ड यज्ञ (हवन), ब्रह्मचर्य, गायत्री, युग धर्म, अहिंसा, पाप और पुण्य, सनातन धर्म, वर्ण व्यवस्था, विप्र, आर्य, गोरक्षा, सती, अवतार और दान इत्यादि की स्पष्ट व्याख्या दी गई है।

महर्षि पतञ्जलिकृतं योगदर्शन

पूज्य स्वामीजी द्वारा श्रीमद्भगवद्गीता के भाष्य ‘यथार्थ गीता’ का विश्व जनमानस में समादर की भावना देखकर भक्तों और साधकों ने निवेदन किया कि पातञ्जल योगदर्शन पर भी पूज्यश्री कुछ कहने की कृपा करें क्योंकि योग स्वानुभूति है जिसे मात्र भौतिक स्तर पर समझा नहीं जा सकता | पूज्य – चरण एक महापुरुष हैं, योग के स्तर से स्वयं गुजरें हैं | भक्तों के आग्रह पर महाराजजी ने कृपा कर जो प्रवचन दिये, प्रस्तुत कृति उसी का संकलन है |

योगदर्शन की इस टीका से, योग क्या है ? इतना तो समझ में आ सकता है किन्तु योग की स्थितियाँ साधना में प्रवृत होने के पश्चात् ही समझ में आती हैं | तप, स्वाध्याय, ईश्वर – प्रणिधान और ओम् के जप से आरम्भ हो जाती हैं जिससे अविधादि क्लेशों के क्षीण होने पर द्रष्टा आत्मा जागृत होकर कल्याणकारी दृश्य प्रसारित करने लगता है | उसी के आलोक में चलकर समझा जा सकता है कि महर्षि पतञ्जलिकृत योगसूत्रों का अभिप्राय क्या है ? योग प्रत्यक्ष दर्शन है, यह लिखने या कहने से नहीं आता | क्रियात्मक चलकर ही साधक समझ पाता है कि जो कुछ महर्षि ने लिखा है उसका वास्तविक आशय क्या है |

भजन किसका करें?

विश्व के प्रत्येक समाज और कबीले में नदी-पहाड़, गाय- पीपल, अनेकानेक देवी-देवताओं की पूजा से लेकर भूत-प्रेत और शैतान भगाने के अनुष्ठानों का बाहुल्य हो चला है। हर जाति और कबीले के अलग-अलग देवता निर्धारित हैं। जन्मते ही लोगों की श्रद्धा अपने-अपने देवी-देवताओं में चली गयी; भगवान की पूजा तक लोग पहुँच ही नहीं पा रहे हैं। यह एक परमात्मा से श्रद्धा हटाने का षड्यन्त्र जैसा लगा। ऐसी परिस्थिति में यह बताना आवश्यक हो गया कि भजन किसका करें? देवता क्या हैं? भूत क्या होता है और पूजा हम किसकी करें? प्रस्तुत पुस्तिका में इन भ्रान्तियों का निवारण करते हुए स्पष्ट किया कि धर्म क्या है? इष्ट कौन है? भजन किसका करें और कैसे करें?

अनछुये प्रश्न

इस पुस्तक में वर्ण, मूर्तिपूजा, ध्यान, हठ, चक्र-भेदन और योग, क्या हिन्दू – धर्म किसी जीवन – शैली का नाम है, हिन्दुत्व जैसे विषयों को स्पष्ट कर भ्रमित समाज का मार्गदर्शन किया गया है ।

बाल गीता (Class 1-5)

यह पुस्तिका बालक के निर्मल मन में एक परमात्मा के प्रति पूर्ण आकर्षण पैदा कर समाज एवं साधना के क्षेत्र में सहज प्रवेश के लिए उपयोगी है। इसमें समर्पण का पाठ्यक्रम अंकित है जिससे बच्चों में धर्म-सन्देश का बीजारोपण, संस्कार पड़ेंगे। वे इस राह पर चलेंगे और अपने ही भगवत्-स्वरूप को प्राप्त कर लेंगे।

बाल गीता (Class 6-10)

यह पुस्तिका बालक के निर्मल मन में एक परमात्मा के प्रति पूर्ण आकर्षण पैदा कर समाज एवं साधना के क्षेत्र में सहज प्रवेश के लिए उपयोगी है। इसमें समर्पण का पाठ्यक्रम अंकित है जिससे बच्चों में धर्म-सन्देश का बीजारोपण, संस्कार पड़ेंगे। वे इस राह पर चलेंगे और अपने ही भगवत्-स्वरूप को प्राप्त कर लेंगे।

भजन से लाभ

दिनांक २० सितम्बर से ३ नवम्बर २०१० तक की अवधि में फरीदाबाद, हिमाचल प्रदेश, नैनीताल एवं नेपाल के समीपवर्ती पर्वतीय क्षेत्रों के भ्रमण के समय नवयुवकों ने भजन एवं अध्यात्म के औचित्य की जिज्ञासाएँ महाराजश्री से कीं।

इस पुस्तिका में नवयुवकों के अनेक प्रश्नों का संक्षेप में समाधान करते हुए भजन की अनिवार्यता पर प्रकाश डाला गया है। यदि एक परमात्मा में मानसिक स्तर से लगते बन गया तो उन प्रभु के संरक्षण में साधना चलती रहेगी, वाह्य कार्यों में भी मदद मिलेगी और आवागमन से मुक्ति तो मिलना ही है क्योंकि ईश्वर-पथ में आरम्भ का नाश नहीं होता।

अंग क्यों फड़कते हैं?

परमात्मा सभी स्थानों से बोल सकते हैं– पेड़ से, पत्थर से, जल एवं थल से, आकाश से, पशु-पक्षी से, नदी तथा पहाड़ से; जड़-चेतन इत्यादि किसी भी माध्यम से निर्देश दे सकते हैं। वे कर्तुं-अकर्तुं अन्यथा कर्तुं समर्थ हैं। सर्वत्र सार्वभौम उनकी छटा है। श्रवण-नयन-मन-गोचर समग्र सृष्टि उन्हीं का यन्त्र-तन्तु है। आर्त अनुरागी भक्तों के लिए जब वह नयनाभिराम प्रेरक बन जाते हैं, तब सब स्थानों से अपना कार्य सम्पादित करते हैं।

इस पुस्तक में मानव शरीर के विभिन्न हिस्सों में होने वाले स्पन्दनों का कारण और उसके संकेतों का विश्लेषण किया गया है जो कि साधना में काफी सहायक है।

मैं कौन हूँ?

जन्म से ही नाना प्रकार के सम्बन्धों में भ्रम हो जाता है कि मैं कौन हूँ? यह जिज्ञासा यौगिक है। ‘वासांसि जीर्णानि…’ – शरीर एक वस्त्र है। यह शरीर छूटा, दूसरा मिला। तामस गुण के कार्यकाल में मृत्यु को प्राप्त हुआ पुरुष पशु, कीट-पतंग इत्यादि अधम योनि प्राप्त करता है। राजसी गुण के कार्यकाल में वह मनुष्य तन पाता है। सात्त्विक गुण के कार्यकाल में देव इत्यादि उन्नत योनि पाता है– हर हालत में योनि पाता है। अत: यह प्रश्न ज्यों-का-त्यों है कि मैं कौन हूँ? वास्तव में जब द्रष्टा यह आत्मा अपने स्वरूप में स्थिर हो जाता है तो वही आपका वास्तविक स्वरूप है।

प्रश्न समाज के – उत्तर गीतासे

श्री परमहंस आश्रम शक्त्तेषगढ़, चुनार, मिर्जापुर (उत्तर प्रदेश) में पधारे हुए कतिपय भक्तों ने गीता से सन्दर्भित प्रश्नों की एक सूची महाराजश्री के समक्ष मई २००५ में प्रस्तुत की, जिसका समाधान पूज्य महाराजश्री के श्रीमुख से प्रस्तुत है।

इस पुस्तिका में सामाजिक, आध्यात्मिक एवं धार्मिक कैसे भी प्रश्न हों, उनका गीता के आलोक में समाधान किया गया है।

पुनर्जन्म और हृदय

पुनर्जन्म – बौद्धिक स्तर पर यह एक उलझा हुआ प्रश्न है। मनुष्य जन्मा, जीवन-यापन किया; शरीर छूटा, चला भी गया; कुछ समझ ही नहीं पाया कि पुनर्जन्म है या नहीं। किन्तु योगाभ्यास की एक निश्चित ऊँचाई से मनुष्य जब गुजरता है तो उसे स्पष्ट दिखाई देता है कि पुनर्जन्म है? मैं क्या था? आगे कहाँ जाना है?

हृदय – शरीर में हृदय कहाँ है जिसमें परमात्मा का निवास है? हृदय का परिचय तथा परमात्मा को जानने की सम्पूर्ण विधि पर प्रकाश डाला गया है। क्रमोन्नत तीन शरीर हैं– स्थूल, सूक्ष्म और कारण। क्रमश: कारण शरीर के अन्तिम स्तर पर साधन पहुँचता है, तहाँ ईश्वर का निवास है। यह पुस्तिका इन्हीं प्रश्नों का पूर्ण परिचय देती है।

योगशास्त्रीय प्राणायाम

योगशास्त्रीय प्राणायाम में आपने बताया है कि यम, नियम और आसन के सधते ही श्वास-प्रश्वास का शान्त प्रवाहित होना ही प्राणायाम है। अलग से प्राणायाम नाम की कोई क्रिया नहीं है। यह योग चिन्तन की एक अवस्था है। इसी का समाधान इस पुस्तक में किया गया है।

अहिंसा का स्वरूप

अहिंसा एक उलझा हुआ प्रश्न है। मूलत: यह यौगिक, आन्तरिक साधना का शब्द है। किन्तु कालान्तर में लोगों ने इसे वाह्य जगत् की जीव-हिंसा से जोड़ दिया।…

इस पुस्तक में हम पायेंगे कि हमारे पूर्वज महापुरुषों ने अहिंसा को किस संदर्भ में लिया है। प्रस्तुत है – गीता के आलोक में ‘अहिंसा’, महाभारत के आलोक में ‘अहिंसा’, श्रीरामचरित मानस में ‘अहिंसा’, महावीर स्वामी की दृष्टि में ‘अहिंसा’ एवं भगवान बुद्ध की दृष्टि में ‘अहिंसा’।

अमृतवाणी ( Part 1 )

संत कबीर की वाणी समझ में न आने पर भी उसका लगाव कम नहीं होता क्योंकि जिस सत्य का उन्होंने वर्णन किया है, वह अनुभव गम्य है, वह वाणी से समझाने में नहीं आता। अभ्यास के परिणाम में जब वह दृश्य स्पष्ट देखने में आ जाता है, तभी समझ में आता है। संत कबीर का कथन है- ‘‘हम कही आँखिन की देखी, तुम कहो कागज की लेखी। मोर तोर मनवा एकै कैसे होय।’’ अतः सबके लिए एक परमात्मा की शरण, एक नाम का जाप और अभ्यास अपेक्षित है।

भाग १ में पूज्य स्वामी श्री अड़गड़ानन्दजी महाराज के मुखारविन्द से नि:सृत अमृतवाणियों का संकलन किया गया है: नैहर दाग लगल मोरि चुनर, बलम राउर देशवा में चुनरी बिकाय, सदगुरु ज्ञान बदरिया बरस, शब्द सो प्रीति करै सोई पाव, अड़गड़ मत है पूरों का, बहुरि न अइहैं कोऊ शूरों के मैदान में, छाओ छाओ हो फकीर गगन में कुटा, तवन घर चेतिहे रे भाई!, का कहीं, केसे कहीं, सा्इं के संग सासुर आई एवं भजन किसका, कैसे और क्यों ।

अमृतवाणी ( Part2 )

भाग २ में पूज्य स्वामी श्री अड़गड़ानन्दजी महाराज के मुखारविन्द से नि:सृत अमृतवाणियों का संकलन किया गया है: सन्तो! जागत नींद न कीजै, मन मस्त हुआ तो क्यों डोले, पनघट पर गगरिया फूटल हो, बूझो बूझो पण्डित अमरित बानी, सन्तो! भगति सदगुरु आनी, नाव बिच नदिया डूबी जाय, पिया तोरी ऊँची रे अँटरिया, गयी झुलनी टूट, चुनर में दाग कहाँ से लागल एवं गाँठ पड़ी पिया बोले न हमसे ।

अमृतवाणी ( Part3 )

भाग ३ में पूज्य स्वामी श्री अड़गड़ानन्दजी महाराज के मुखारविन्द से नि:सृत अमृतवाणियों का संकलन किया गया है: न तसबीह काम आयेगी, अगर है शौक मिलने का, मय पीकर जे बउराइ गवा, दुनियाँ जिसे कहते हैं, तू दैरे हरम का मालिक है, चदरिया झीनी झीनी बीनी, करमाँरी रेखा न्यारी न्यारी, क्या नैना झमकावै एवं अवधू! ऐसा ज्ञान न देखा ।

अमृतवाणी ( Part4 )

भाग ४ में पूज्य स्वामी श्री अड़गड़ानन्दजी महाराज के मुखारविन्द से नि:सृत अमृतवाणियों का संकलन किया गया है: जाड़न मरो सारी रात, मोरे सैंया निकसि गये मैं ना लड़ी, गुरु ने पठाया चेला न्यामत लाना, तुम चलो दिवाने देस, पिवत नाम रस प्याला, संतो! यह मुरदों का गाँव, गइया एक बिरंचि दियो है एवं दरस दिवाना बावला ।

अमृतवाणी ( Part5 )

भाग ५ में पूज्य स्वामी श्री अड़गड़ानन्दजी महाराज के मुखारविन्द से नि:सृत अमृतवाणियों का संकलन किया गया है: सन्तो! सहज समाधि भली, घूँघट के पट खोल री, आलम है उदासी का, बन्दगी हो तो उस शान की बन्दगी, धोबिया जल बिच मरत पियासा, पानी बिच मीन पियासी एवं ससुरा से गवना उलटि चला रे नैहरवा ।

अमृतवाणी ( Part6 )

भाग ६ में पूज्य स्वामी श्री अड़गड़ानन्दजी महाराज के मुखारविन्द से नि:सृत अमृतवाणियों का संकलन किया गया है: रस गगन गुफा से अजर झरै, अब हम दोनों कुल उजियारी, अनेकों प्रश्न ऐसे हैं जो दुहराये नहीं जाते, तोड़ना टूटे हुए दिल को बुरा होता है, सिद्ध है सोइ अतीत कहावै, पायो जी मैंने नाम रतन धन पायो, राम कहत चलु भाई रे एवं सद्गुरु की हाट अलग लागी ।

अमृतवाणी ( Part7)

भाग ७ में पूज्य स्वामी श्री अड़गड़ानन्दजी महाराज के मुखारविन्द से नि:सृत अमृतवाणियों का संकलन किया गया है: दरबार में सच्चे सद्गुरु के, सन्तो सतगुरु अलख लखाया, प्यास बुझावै बिन पानी, कोई अपने में देखा सा्इं संत अतीत, कबिरा कब से भया बैरागी, बिरहिनी मंदिर दियना बार, वा घर की कोई सुध न बतावे एवं चोलिया काहे न धुलाई ।

बारहमासी

अपने पूज्य गुरु श्री परमानन्द जी महाराज को आकाशवाणी से प्राप्त भजन (ईश्वरीय गायन) बारहमासी का संकलन एवं उसकी व्याख्या की है। इसमें प्रवेशिका से लेकर पराकाष्ठा तक लक्ष्य की ओर बढ़ने का पथ-प्रदर्शन किया गया है।

भगवान और सद्गुरु

मकर संक्रान्ति २०१६ के पावन पर्व पर तीर्थराज प्रयाग में कुछेक श्रद्धालुओं ने पूज्य महाराज जी से जिज्ञासा की कि भगवान और सद्गुरु के स्वरूप का विश्लेषण किया जाय! भक्तों की जिज्ञासा पर एतद्विषयक पूज्य महाराज जी के विचार प्रस्तुत हैं।

देवी पूजन

देवी पूजन की वास्तिविकता क्या है ? – श्री परमहंस आश्रम शक्तेषगढ़, मीरजापुर में पधारनेवाले भक्तों ने निवेदन किया कि गीता के अनुसार आप कहते हैं कि ब्रह्मा से लेकर यावन्मात्र जगत्, दिति–अदिति की संतानें देवी-देवता, दानव और मानव सभी क्षणभंगुर, दु:खों की खानि और जन्मने-मरने के स्वभाववाले हैं इसलिए भजन एक परमात्मा का ही करना चाहिए; फिर भारत में इतने सारे देवी-देवताओं की पूजा क्यों होती है? दूसरे ने कहा कि स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी भी काली की पूजा करते थे। किसी ने कहा– आजकल दुर्गा-पूजा का प्रचलन बढ़ रहा है, इसका माहात्म्य बताया जाय। भक्तों की जिज्ञासा पर जनवरी-फरवरी २०१५ के कतिपय दैनिक प्रवचनों से एतद्विषयक पूज्य महाराज जी के विचार प्रस्तुत हैं।

गीता के प्रमुख प्रश्न

इस कृति में अनेक प्रश्नों का समाधान किया गया है जो सामाजिक बिखराव के उन्मूलन तथा धार्मिक भ्रान्तियों के निवारण में सहायक हैं। इसमें धर्म-सिद्धान्त एक, महायोगेश्वर श्रीकृष्ण, यज्ञ, कर्म, गीतोक्त वर्ण-व्यवस्था, वर्णसंकर, ज्ञानयोग एवं निष्काम कर्मयोग, गीतोक्त युद्धस्थल, गीतोक्त युद्ध, सनातन-धर्म (हिन्दू-धर्म), भगवान कर्ता हैं या अकर्ता ?, विप्र, देवता की स्पष्ट व्याख्या दी गई है।

इन प्रश्नों के साथ ही सदियों से चली आ रही अनेकानेक धार्मिक गुत्थियों का पहली बार समाधान प्रस्तुत करनेवाली श्रीमद्भगवद्गीता की यथावत् व्याख्या के लिए देखें – ‘यथार्थ गीता’।

त्र्यम्बकं यजामहे

त्र्यम्बकं यजामहे – दिनांक ०९/०५/२०२० ई० को पूज्य महाराज जी द्वारा पालघर से बरचर आश्रम पधारने के पश्चात् पालघर आश्रम के एक भक्त जी द्वारा महामृत्युंजय मंत्र ‘त्र्यम्बकं यजामहे….’, रुद्रीपाठ और रुद्राभिषेक के धार्मिक औचित्य की जिज्ञासा पर दिनांक २०/०५/२०२० को पूज्य महाराज जी द्वारा प्रस्तुत विचार।

एकलव्य का अंगूठा

एकलव्य का अंगूठा – इस पुस्तक में शिक्षा-गुरु और सद्गुरु में अन्तर बतलाया गया है। शिक्षक, लोकजीवन की कला सिखाते हैं जबकि सद्गुरु जीवन में समृद्धि के साथ परमश्रेय की जागृति और उस परम पद की प्राप्ति कराते हैं जिससे पुरुष आवागमन से मुक्त हो जाता है।

षोडशोपचार पूजन पद्धति

षोडशोपचार पूजन पद्धति षोडश संस्कार एवं हवन-पद्धति – इस पुस्तक में यह बताया गया है कि एक परमात्मा में श्रद्धा स्थिर कराकर, उस एक परमात्मा का चिन्तन सिखाना ही कर्मकाण्ड है।

Bal Geeta English Part 1

For All the Students of the World.

This interpretation of the Bhagwad Geeta, as it is, is easy to understand for children from 1st to 5th Standard. This text should become a part of the child‛s life as it will help them understand who they are, and help them for the future, in an unimaginable way to inculcate values amongst children. This is the most historical and important moment of your life since you are going to be introduced to the Geeta. The Geeta is an ocean of knowledge, and the first epic that narrates the word of God. The knowledge present in the Geeta, was spread to all at the beginning of creation. It is an ancient and priceless source of wealth to humanity and today it shall be revealed to you.

Arya, Sanatan & Hindu Dharm

Dharm is Never Mutable.

On the morning of 4th April, 2011 in Paramhans Ashram, Shakteshgarh, Uttar Pradesh, during a spiritual discourse, a devotee asked a question – “Maharaj Ji, these days we hear about the proselization of Hindu, please tell us the solution to this problem?” Revered Maharajshri replied that this concern has been dealt with at various places within the Ashram Literatures. Most revered Sri Paramhans Maharaj Ji faced a similar question that the word “Hindu” is not found inside the ancient Indian scriptures. This nomination had been hatefully addressed by Arab invaders, in the past, for the people residing on the banks of river Sindhu, which by efflux of time had also become a mark of identification of the residents in this same area; then, how ‘Hindu dharm is Sanatan dharm’ ?

Dharm In Its True Perspective

In the whole of the India, from time immemorial, there has been only one definition for Dharm, in which there is only one God, one practice, and finally one result i.e. attainment of God. The method of awakening of this attainment is possible only through an enlightened and totally accomplished teacher (Sadguru). Solutions to all the problems of materialistic world, provisions of felicitous human life and attainment of ultimate bliss are all the benefaction of the Dharm. Scripture has been provided by Lord Krishn himself, interpretation of which is the subject matter of totally accomplished and enlightened sages. But, since last almost two thousand years, mainly from the era of Pushyamitra Shung, distortions initiated taking place in the Dharm since the decision making power got vested into the educationist teachers through the passage of time. Nowadays, so many activities have cropped up using the name of Dharm, such as patriotism, amiableness, social service etc. which are not Dharm in its true sense.

Glories of Yog

The devotees requested Maharaj Shree to remove the cobwebs of wrong notions and throw light on the true nature of Pranayama. Further, queries and questions were raised on Hath – Chakra – Penetration and Yoga? Whether Idol worship is desirable or not? What is real Yoga? A lot of confusion exists regarding various forms of Yoga like Hatha Yoga, Raj Yoga, Laya Yoga and Kundalini Yoga, Shat Chakra Yoga and Yoga – Asanas? Some queries were regarding the true nature of Dhyana (Meditation) which have been forwarded for exposition by the saints gathered at the Ashram at large. Many of them have attended Meditation camps at different places but failed to get peace. One of them was particularly inquisitive to know about – what is Meditation and on whom to meditate? As there was a lot of confusion about it was prevailing in the society.

Maharaj Shree was kind enough to speak on this subject and make a thread – bare analysis of it for the benefit and welfare of the devotees. The talk was delivered in Hindi. The English rendering of it is presented to the World – wide circulation.

Jeevanadarsh Evam Atmanubhuti

Realisaiton of the God, incarnation and medium of their divine speech are only the great and enlightened sages. With this fact in mind, the propitious like sketch of Rev. Paramhans Ji Maharaj Ji is being published for the spiritual development of the humanity at large.

The ideal life, miraculous events, the Barahmasi to uplift and enlighten the self – realisation, Glimpses of Discourses, Super – human powers and faculties are included in this work. This book will provide guidance to the persons treading the path of life and when they accept the directions set in, attain the greatest of the ultimate aims.

This work endeavours to explain the ancient traditional spiritual truth and the path of ultimate bliss. Hence, you shall be able to get the divine inspiration from this book as to how and where to search for the Truth.

Ahinsa: In the view of Indian Sages

Ahimsa (Ahinsa) is a complicated question. It is a Yogic word, the word which points out to the inner spiritual Sadhana, but later on people linked it with the violence of living beings of the external world.

In this book, we will find how our ancestors, great sages, have taken non-violence. In this book – ‘Ahimsa’ in the light of the Srimad Bhagavad Gita, Mahabharata, Shri Ramcharitmanas, Mahavira Swami and Gautama Buddha have been explained.

Why do the Body Parts vibrate? What do they say?

God can speak from all places – through tree, through rocks, through water & land, through firmament, through animals-birds, through rivers & mountains, through animate-inanimate etc, thus he can deliver instructions through any medium. He is the doer, non-doer & capable to get done through the other mean. The whole world everywhere is his brilliance. Perceived through ears- eyes-mind & senses – this entire creation is his instrument’s string. For afflicted loving devotees, when he, becomes such inspirer, ‘who contents the eyes’, then he accomplishes his work from all places.

In this book, the cause of the vibrations and its signs in different parts of the human body has been analyzed, which is very helpful in the spiritual practice.

Who should be Worshipped?

Innumerable systems of worships are prevalent these days, instead of one prescribed system of attainment of One God propounded by the Geeta and other scriptures on Yoga. Some might say worshipping the cow is true religion (gau-dharma), whereas according to others Peepal tree (a holy tree) could be true religion (Dharma); while some other might exhort the importance of caste-system (varna) and ashrams. Hence, ‘what is a true Universal Religion’ is the question, baffles many a minds. The question today is similar as ‘Who is our God? Who should be worshipped?’ This is the primary book of the path of worship and spiritual path. Must read.

Maharishi Patanjali’s Yogdarshan

After the publication of Yatharth Geeta, which is a commentary on “Srimad Bhagavad Gita”, the devotees requested the revered Swami Ji to throw light on Patanjali’s Yog Darshan too because yog is related with self – realisation. It cannot be perceived on material grounds. The revered Maharaj Shree is a Mahapurush who has passed through all the stages of Yog. The present work is the collection of what Maharaj Shree delivered in his preaching.

By going through this commentary one can understand what Yog is but the real perception of Yog is possible only after practical pursuit of Yogic – Sadhana. With Tap, Swadhyaya, Ishwar – Pranidhan and chanting of Om, the real Sadhana starts. By their practice, the Avidhya and Kleshas got removed and the self starts transmitting beneficial vistas. In their light alone the Yogic – maxims written by Maharishi Patanjali can be truly comprehended. Yog is direct perception, no oral or written words can explain it. Practical pursuits alone can make the comprehension of Yog – Darshan possible.

Reservations & Doubts of Society – Their Resolution

Some of the devotees of Shri Paramahans Ashram Shakhteshgarh, Chunar, Mirzapur (Uttar Pradesh) presented a list of questions related to Gita in the month of May 2005 before Maharaj Shree, whose solution is presented in the words of Revered Swami Ji.

In this booklet all the social, religious and spiritual questions have been resolved in the light of Srimad Bhagavad Gita.

Prerna Strot

Some of the features of this book inter-alia includes: Life of Swami Ji, Attractive feature of Yatharth Geeta, Divine Messages proclaimed by the Holy Saint, Problems of Humanity and Solution, An Immortal Messages for the Humanity.

Gains By Bhajan – Queries By Youngsters

During the tour of Faridabad, Himanchal Pradesh, Nainital and the hilly regions near Nepal from September 20 to 3rd November 2010, some young persons expressed their doubts and inquisitiveness to Maharaj Shri know about the utility of Bhajan and spirituality which he has, thus very cogently answered.

This book briefly summarizes many questions of young people, highlighting the imperative requirement of hymns. If a person is devoted to One God in the spiritual plane, then he will continue to lead the sadhana in the protection of the Lord, not only he will receive help in his wordly affairs, the ultimate beatitude (salvation) is sure to be attained because any progress made in this path, shall never be lost.

Resolutions of Doubts

In order to free society from the clutches of misleading religion rituals, Swamiji compiled a book – ‘Shanka Samadhan’ (Doubts and clarifications). In this book, Swamiji has resolved the prevailing pretentious rituals by giving references of the discourses of the great saints and sages as well as citing the dictates of the Srimad Bhagavad Gita, the Ramayana and the Purana on topics such as Who should be Worshiped, Religious Rituals (Karmkand), Havan, Yagya (Sacrificial Action), Celibacy, Gayatri, Yuga Dharma, Non-violence (Ahimsa), Sin and Righteousness, Santana Dharma, Varna (Caste System and its Classification), Vipra, Arya, Protection of Cows (Gau Raksha) etc.

Untouched Questions

‘Anchhuye Prashna’ or ‘Unexplained Questions’ – In this book, Swami Ji has taken up such questions, which have not come to the notice of the society. Besides, clarification has been provided on the subjects related with Dhyana (meditation), Hath Yoga, Chakra Bhedan and Yoga etc. and guidance has been provided to the disillusioned masses.

Bal Geeta Gujarati Part 1

Bal Geeta Gujarati Part 1 for Students of 1st to 5th Standard.

Bal Geeta Gujarati Part 2

Bal Geeta Gujarati Part 2 for the Students of 6th to 10th Standard.

સાધના કરવી તો કોની?

આદિ ધર્મશાસ્ત્ર ગીતા અને અન્ય યોગશાસ્ત્રો મુજબ એક પરમાત્માની પૂજા અને તેને મેળવવા માટેની એક ચોક્કસ ક્રિયા (નિશ્ચિત કર્મ)ને બદલે અસંખ્ય પદ્ધતિઓ ચલનમાં છે. ધર્મને નામે લોકો ગાય, પીપળો, દેવી-દેવતાઓ, ભૂત-ભવાનીની પૂજા કરે છે. પ્રસ્તુત પુસ્તકમાં આ બધી જ ભ્રાન્તિઓનું ખંડન કરીને સ્પષ્ટપણે જણાવાયું છે કે, સનાતન ધર્મ શું છે ?, ઇષ્ટ કોણ છે ? સાધના કરવી તો કોની? કેવી રીતે ભજવા ? પૂર્વગ્રહોથી મુક્ત બનીને આ પુસ્તકનું વાંચન અને મનન કરતાં, આ પુસ્તક આપને ખળભળાવી મૂકશે…સ્પષ્ટ થઇ જશે કે સાધના કરવી તો કોની કરવી. સાધના પથના પથિક માટે આ પાયાનું પુસ્તક છે. અવશ્ય વાંચવું.

અહિંસા (ગુજરાતી)

અહિંસા, એક ગૂંચવાયેલો પ્રશ્ન છે. મૂળમાં તો આ યૌગિક, આંતરિક સાધનાનો શબ્દ છે. પરંતુ સમયાંતરે, લોકોએ તેને આ બાહ્ય જગતની જીવ-હિંસા સાથે જોડી દીધો.

આ પુસ્તક દ્વારા આપણે જાણશું કે આપણા પૂર્વજ મહાપુરૂષો અહિંસાને કયા સંદર્ભથી જોતા હતા. ગીતાના જ્ઞાનપ્રકાશની નજરે ‘અહિંસા’, મહાભારતના પરિપ્રેક્ષ્યમાં ‘અહિંસા’, શ્રીરામચરિત માનસમાં ‘અહિંસા’, મહાવીર સ્વામીની દ્રષ્ટિએ ‘અહિંસા’ અને ભગવાન બુદ્ધની નજરમાં ‘અહિંસા’.

યોગશાસ્ત્રીય પ્રાણાયામ

યોગશાસ્ત્રીય પ્રાણાયામમાં આપે કહ્યું છે કે યમ, નિયમ અને આસન સધાતાં જ શ્વાસ-ઉચ્છવાસ શાંતિપૂર્વક પ્રવાહિત થવાનું શરૂ થાય, એ જ પ્રાણાયામ છે. પ્રાણાયામ નામની અલગથી કોઇ જ ક્રિયા નથી. યોગ ચિંતનની આ એક અવસ્થા છે. આ જ વાતને આ પુસ્તકમાં વિસ્તૃતપણે સમજાવાઇ છે.

શંકા સમાધાન

આ કૃતિમાં અનેક પ્રશ્નોનું સમાધાન આપવામાં આવ્યું છે, જે સમાજને તૂટતો રોકવામાં અને ધાર્મિક ભ્રાન્તિઓનું નિવારણ કરવામાં મદદરૂપ છે. સાધના કરવી તો કોની કરવી, કર્મકાંડ યજ્ઞ (હવન), બ્રહ્મચર્ય, ગાયત્રી, યુગ ધર્મ, અહિંસા, પાપ અને પુણ્ય, સનાતન ધર્મ, વર્ણ વ્યવસ્થા, વિપ્ર, આર્ય, ગોરક્ષા, સતી, અવતાર અને દાન વગેરે વિશે અહીં સ્પષ્ટપણે સમજાવવામાં આવ્યું છે.

ષોડશોપચાર પૂજન પદ્ધતિ

આ પુસ્તકમાં કહેવાયું છે કે એક પરમાત્મામાં શ્રદ્ધા સ્થિર કરાવીને, તે એક પરમાત્માનું ચિંતન કરતાં શીખવવું એ જ કર્મકાંડ છે.

એકલવ્યનો અંગૂઠો

શિક્ષણ આપનારા ગુરૂ અને સદ્‍ગુરૂ વચ્ચે શો તફાવત છે તે અહીં જણાવાયું છે. શિક્ષક લોકજીવનની કલા શીખવે છે, જ્યારે સદ્‍ગુરૂ એ શીખવે છે કે જીવનમાં સમૃદ્ધિની સાથોસાથ પરમ શ્રેયને કઇ રીતે જાગૃત કરવું, જેથી પુરૂષ આવાગમનનાં ચક્રમાંથી મુક્ત થાય.

Bal Geeta Marathi Part 1

Bal Geeta Marathi Part 1 for Students of 1st to 5th Standard.

Bal Geeta Marathi Part 2

Bal Geeta Marathi Part 2 for Students of 6th to 10th Standard.

अहिंसेचे स्वरूप

अहिंसा एक गुंतागुंतीचा प्रश्न आहे. मुळात हा यौगिक आंतरिक साधनेचा शब्द आहे. परंतु कालांतराने लोकांनी त्याला बाह्य जगतातील जीव-हिंसेशी जोडले.

ह्या पुस्तकात आपल्याला पहायला मिळेल की, आपले पूर्वज महापुरुषांनी अहिंसा कोणत्या संदर्भात घेतलेली आहे. प्रस्तुत आहे – गीतेच्या आलोकात ‘अहिंसा’, महाभारताच्या आलोकात ‘अहिंसा’, श्रीरामचरित मानसात ‘अहिंसा’, महावीर स्वामींच्या दृष्टीने ‘अहिंसा’ आणि भगवान बुद्धांच्या दृष्टीने ‘अहिंसा’.

अनाकलनीये प्रश्न

ह्या पुस्तिकेत वर्ण, मूर्तिपूजा, ध्यान, हठ, चक्रभेदना आणि योग, हिंदू धर्म एखाद्या जीवनशैलीचे नाव आहे का, हिंदुत्व यांसारखे विषय स्पष्ट करून भ्रमित समाजाला मार्गदर्शन केलेले आहे.

अवयव का फडकतात? काय सूचित करतात?

परमेश्वर कोणत्याही वस्तू मार्फत बोलू शकतो – झाडे, दगड, जल पृथ्वी-आकाश, पशु-पक्षी, नदी तसेच डोंगर इत्यादि जड अथवा चेतन अशा कोणत्याही माध्यमातून आज्ञा देऊ शकतो. तो कर्ता-अकर्ता आहे. तो समर्थ आहे व सर्व काही करू शकतो. त्याची सार्वभौम सत्ता आहे. कान- डोळे-मन इत्यादी इंद्रियांनी ग्रहण करता येणारी समग्र सृष्टि परमेश्वराचेच साधन (यंत्र) आहे. आर्त, अनुरागी भक्तासाठी जेव्हा नयनरम्य असा परमेश्वर प्रेरक बनतो, तेव्हा सर्व स्थानांमार्फत आपले कार्य संपादित करतो.

ह्या पुस्तकात मानव शरीराच्या वेगवेगळ्या भागांमध्ये होणाऱ्या स्पंदनांचे कारण आणि त्यांच्या संकेतांचे विश्लेषण केलेले आहे, ज्यांची साधना करताना खूप मदत होते.

भजन कोणाचे करावे?

आदि धर्मशास्त्र गीता आणि इतर योगशास्त्रांनुसार एका परमात्म्याची पूजा आणि त्याच्या प्राप्तीची एक निर्धारित क्रिया (नियत कर्म) यांच्या ठिकाणी असंख्य पूजापद्धती प्रचलित आहेत. लोक गाय, पिंपळ, देवदेवता, भूतभवानी यांची पूजा धर्माच्या नावाने करीत असतात. प्रस्तुत पुस्तकातही ह्या सर्व भ्रमांचे निवारण करून स्पष्ट करून सांगितलेले आहे की सनातन धर्म म्हणजे काय. इष्ट कोण आहे? भजन कोणाचे करावे? आणि कसे करावे? पूर्वग्रहांपासून मुक्त असलेल्या मेंदूने ह्या पुस्तकाचा अभ्यास आणि मनन तुम्हाला ज्ञानी बनवील, भजन कोणाचे करावे हे स्पष्ट होईल. साधनापथावरील पथिकांसाठी हे प्रथम पुस्तक आहे. नक्की वाचा.

एकलव्याचा अंगठा

शिक्षण देणारे गुरू आणि सद्गुरूंमध्ये अंतर सांगीतले गेले आहे. शिक्षक लोकजीवनातील कला शिकवतात, तर सद्गुरू जीवनात समृद्धीबरोरच परमश्रेयाची जागृती आणि त्या परम पदाची प्राप्ती करून देतात, ज्यामुळे पुरुष जन्मजन्मांतरीच्या फेऱ्यातून मुक्त होतो.

योगशास्त्रीय प्राणायाम

योगशास्त्रीय प्राणायामात त्यांनी सांगितलंय की, यम, नियम आणि आसन करताना श्वास-प्रश्वास शांतपणे प्रवाहित होणे म्हणजे प्राणायाम. प्राणायाम नावाची वेगळी कोणतीच क्रिया नाही. ही योगचिंतनाची एक अवस्था आहे. ह्याचेच उत्तर ह्या पुस्तकात दिलेले आहे.

प्रश्न समाजाचे – उत्तरे गीतेतील

श्री परमहंस आश्रम शक्त्तेषगड, चुनार, मिर्जापूर (उत्तर प्रदेश) मध्ये अवतरलेल्या कतिपय भक्तांनी गीतेच्या संदर्भित प्रश्नांची एक सूची महाराजश्री यांच्या समोर मे 2005 मध्ये प्रस्तुत केली, ज्याचे समाधान पूज्य महाराजश्री यांच्या श्रीमुखातून प्रस्तुत आहे.

या पुस्तिकेत सामाजिक, आध्यात्मिक आणि धार्मिक असे कोणतेही प्रश्न असोत, त्यांचे गीतेच्या आलोकात उत्तर दिलेले आहे.

पुनर्जन्म- हृदय

पुनर्जन्म – बौद्धिक स्तरावर पडलेला हा एक गुंतागुंतीचा प्रश्न आहे. मनुष्याने जन्म घेतला, जीवन व्यतीत केले, शरीर सोडले, निघूनही गेला, काहीच समजले नाही की पुनर्जन्म आहे किंवा नाही. परंतु योगाभ्यासाच्या एका निश्चित उंचीवरून माणूस जेव्हा जातो, तेव्हा त्याला स्पष्टपणे दिसते की पुनर्जन्म आहे? मी काय होतो? पुढे कुठे जायचे आहे?

हृदय – शरीरात हृदय कुठे आहे, ज्यात परमात्मा राहतो? हृदयाचा परिचय आणि परमात्म्याला ओळखण्याच्या संपूर्ण विधीवर प्रकाश टाकलेला आहे. क्रमानुसार उन्नत होणारी तीन शरीरे आहेत – स्थूल, सूक्ष्म आणि कारण. अनुक्रमे कारण शरीराच्या अंतिम स्तरावर साधन पोहोचते, तेथे ईश्वर राहतो. ही पुस्तिका ह्या प्रश्नांचा संपूर्ण परिचय देते.

কার ভজন করবো?

আদি ধর্ম-শাস্ত্র গীতা এবং অন্যান্য যোগশাস্ত্র মতে, এক পরমাত্মার উপাসনা এবং তাকে প্রাপ্ত করার এক নির্ধারিত ক্রিয়া (নিয়ত কর্ম) -এর স্থানে অসংখ্য পূজার প্রথা প্রচলিত আছে। মানুষজন ধর্মের নামে গরু, গাছা পালা, দেবতা, ভুত-ভবানী, ইত্যাদির পূজা করছে। এই সমস্ত কাহিনীগুলি সংগৃহিত করে বইটিতে সংরক্ষণ করা হয়েছে এবং এতে সুস্পষ্ট হয়েছে যে শাশ্বত ধর্ম আসলে কি? ইষ্টদেবতা কে? ভজন কার করবো? এবং কিভাবে করবো? এই গ্রন্থের অধ্যয়ন ও ধ্যানধারণা, প্রাক্তনী কুসংস্কার থেকে মুক্ত মস্তিষ্কের দ্বারা আপনাকে ঝাকুনি দেবে, ভজন কার করবেন, সেটা স্পষ্ট হয়ে যাবে। সাধনা-পথের পথিকের এটা প্রাথমিক বই। অবশ্যই পড়তে ভুলবেন না।

भारतीय महापुरुषहरुको दृष्टिमा अहिंसाको स्वरुप

अहिंसा एक उलझनले भरिएको प्रश्न हो। मूलत: यो यौगिक, आन्तरिक साधनाको शब्द हो। तर कालान्तरमा मानिसहरूले यसलाई वाह्य जगतको जीव-हिंसासँग जोडिदिए।… यस पुस्तकमा हामी हाम्रो पूर्वज महापुरुषहरूले अहिंसालाई कुन संदर्भमा लिएका थिए भन्ने जान्न पाउँछौं । प्रस्तुत छ – गीताको आलोकमा ‘अहिंसा’, महाभारतको आलोकमा ‘अहिंसा’, श्रीरामचरित मानसमा ‘अहिंसा’, महावीर स्वामीको दृष्टिमा ‘अहिंसा’ एवं भगवान बुद्धको दृष्टिमा ‘अहिंसा’।

भजन कसको गर्नु ?

आदि धर्मशास्त्र गीता तथा अन्य योगशास्त्रहरू अनुसार एक परमात्माको पूजा एवं उसलाई प्राप्त गर्ने एक निर्धारित क्रिया (नियत कर्म) को स्थानमा असंख्य पूजा विधिहरू प्रचलनमा रहेको छ। मानिसहरू धर्मको नाममा गाय, पीपल, देवी-देवता, भूत-भवानीको पूजा गर्दछन्। प्रस्तुत पुस्तकमा यी सबै भ्रान्तिहरूको निवारण गर्दे सनातन धर्म के हो भनेर स्पष्ट पारिएको छ? इष्ट को हुन् ? भजन कसको गर्नु ? र कसरी गर्नु ? पूर्वाग्रहबाट मुक्त दिमाग लिएर यस पुस्तकको अध्ययन र मनन गरे यसले तपाईंलाई झकझक्याउने छ, भजन कसको गर्नु त्यो पनि स्पष्ट हुनेछ। साधना-पथको पथिकको यो प्राथमिक पुस्तक हो। अवश्य पढ़्नुहोस्।

शंका समाधान

यस कृतिमा अनेक प्रश्नहरूको समाधान दिइएको छ जो सामाजिक अस्त व्यस्तताको उन्मूलन तथा धार्मिक भ्रान्तिहरूको निवारणमा सहायक हुन्छ। यसमा भजन कसको गर्नु, कर्मकाण्ड यज्ञ (हवन), ब्रह्मचर्य, गायत्री, युग धर्म, अहिंसा, पाप और पुण्य, सनातन धर्म, वर्ण व्यवस्था, विप्र, आर्य, गोरक्षा, सती, अवतार तथा दान इत्यादिको बारेमा स्पष्ट व्याख्या गरिएको छ।

महर्षिपतञ्जलिप्रणीतं – योगदर्शनम्: पतञ्जलि योगसूत्र भाष्य संस्कृत

पूज्य स्वामीजीद्वारा श्रीमद्भगवद्गीताया भाष्यं यथार्थगीताया विश्वजनमानसे समादरभावनां समवलोक्य भक्तासाधकाश्च निवेदनं कृतवन्त:, यत् पातञ्जलयोगदर्शन विषयेऽपि पूज्य श्रीस्वामिन: प्रकाशं कत्र्तुं कृपां कुर्वन्तु। यतो हि योग: योगिप्रवरानुभूतिगम्योऽस्ति, मात्र भौतिकस्तरेण हृदयङ्गमं कत्र्तुमशक्य:। पूज्यचरणा: सन्ति महापुरुषा: योग पथानुभवप्रौढा:। भक्तानामाग्रहोपरि श्रीपूज्यमहाराजा: कृपां कृत्वा यत् प्रवचनं दत्तवन्त: प्रस्तुतकृतिस्तस्य संकलनमस्ति।

योगदर्शनस्य प्रस्तुतानया टीकया किमस्ति योग? एतन्तु बोधे समागन्तुं शक्नोति, किन्तु योगस्य स्थितय: साधनायां प्रवृत्यन्तरमेव बुद्धिपथायिता: भवन्ति। तपसा, स्वाध्यायेन-ईश्वरप्रणिधानेन, ओम् इत्यस्य जपेन च स्थितय: प्रारम्भा: भवन्ति, यदारम्भेनाविद्यादिक्लेशेषु क्षीणेषु द्रष्टा, आत्मा जागृतो भूत्वा श्रेयस्करं दृश्यं प्रसारयितुमारभते। तदालोके चलित्वा ज्ञातुं शक्यते, यत् महर्षिपतञ्जलेर्योगसूत्राणामभिप्राय: किमस्ति? योग: प्रत्यक्षं दर्शनमस्ति, इदं लेखेन प्रवचनेन च न भवति बोधगम्यम्। क्रियात्मकविधिनाऽग्रेसरो भूत्वा साधक: सम्यग्जानाति यत् यत्किञ्चित्महर्षि: लिलेख, तस्य वास्तविक: किमस्त्याशय:?